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9 अगस्त 2016

हिरोशिमा की पीड़ा / अटल बिहारी वाजपेयी

किसी रात को
मेरी नींद चानक उचट जाती है
आँख खुल जाती है
मैं सोचने लगता हूँ कि
जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का
आविष्कार किया था
वे हिरोशिमा-नागासाकी के भीषण
नरसंहार के समाचार सुनकर
रात को कैसे सोए होंगे?
क्या उन्हें एक क्षण के लिए सही
ये अनुभूति नहीं हुई कि
उनके हाथों जो कुछ हुआ
अच्छा नहीं हुआ!

यदि हुई, तो वक़्त उन्हें कटघरे में खड़ा नहीं करेगा
किन्तु यदि नहीं हुई तो इतिहास उन्हें
कभी माफ़ नहीं करेगा!



7 अगस्त 2016

 तुम तक दिल के भावों को लाऊँ कैसे —--महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’ 

तुम तक दिल के भावों को लाऊँ कैसे
तुमसे उल्फ़त है ये समझाऊँ कैसे
शब्दों में जो पूछा वो तो समझा है
नज़रों का मतलब लेकिन पाऊँ कैसे
मैंने मन में शक को ना हरगिज़ पाला
दिलबर का शक ख़ारिज करवाऊँ कैसे
जीवन पथ में मिल कर हमको चलना था
आधे रस्ते से अब मुड़ जाऊँ कैसे
मैंने बंधन को कर्तव्य ख़लिश समझा
मन में दूजे को मैं बिठलाऊँ कैसे.

महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’
द्वारा एक मंच  गुगल समुह पर...
दिनांक 7 अगस्त 2016

26 जून 2016

कफन फाड़कर मुर्दा बोला / श्यामनन्दन किशोर

चमड़ी मिली खुदा के घर से
दमड़ी नहीं समाज दे सका
गजभर भी न वसन ढँकने को
निर्दय उभरी लाज दे सका

मुखड़ा सटक गया घुटनों में
अटक कंठ में प्राण रह गये
सिकुड़ गया तन जैसे मन में
सिकुड़े सब अरमान रह गये

मिली आग लेकिन न भाग्य-सा
जलने को जुट पाया इंधन
दाँतों के मिस प्रकट हो गया
मेरा कठिन शिशिर का क्रन्दन

किन्तु अचानक लगा कि यह,
संसार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी
मरने पर उपकार हो गया

श्वेत माँग-सी विधवा की,
चदरी कोई इन्सान दे गया
और दूसरा बिन माँगे ही
ढेर लकड़ियाँ दान दे गया

वस्त्र मिल गया, ठंड मिट गयी,
धन्य हुआ मानव का चोला
कफन फाड़कर मुर्दा बोला।

कहते मरे रहीम न लेकिन,
पेट-पीठ मिल एक हो सके
नहीं अश्रु से आज तलक हम,
अमिट क्षुधा का दाग धो सके

खाने को कुछ मिला नहीं सो,
खाने को ग़म मिले हज़ारों
श्री-सम्पन्न नगर ग्रामों में
भूखे-बेदम मिले हज़ारों

दाने-दाने पर पाने वाले
का सुनता नाम लिखा है
किन्तु देखता हूँ इन पर,
ऊँचा से ऊँचा दाम लिखा है

दास मलूका से पूछो क्या,
'सबके दाता राम' लिखा है?
या कि गरीबों की खातिर,
भूखों मरना अंजाम लिखा है?

किन्तु अचानक लगा कि यह,
संसार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी
मरने पर उपकार हो गया।

जुटा-जुटा कर रेजगारियाँ,
भोज मनाने बन्धु चल पड़े
जहाँ न कल थी बूँद दीखती,
वहाँ उमड़ते सिन्धु चल पड़े

निर्धन के घर हाथ सुखाते,
नहीं किसी का अन्तर डोला
कफ़न फाड़कर मुर्दा बोला।

घरवालों से, आस-पास से,
मैंने केवल दो कण माँगा
किन्तु मिला कुछ नहीं और
मैं बे-पानी ही मरा अभागा

जीते-जी तो नल के जल से,
भी अभिषेक किया न किसी ने
रहा अपेक्षित, सदा निरादृत
कुछ भी ध्यान दिया न किसी ने

बाप तरसता रहा कि बेटा,
श्रद्धा से दो घूँट पिला दे
स्नेह-लता जो सूख रही है
ज़रा प्यार से उसे जिला दे

कहाँ श्रवण? युग के दशरथ ने,
एक-एक को मार गिराया
मन-मृग भोला रहा भटकता,
निकली सब कुछ लू की माया

किन्तु अचानक लगा कि यह,
घर-बार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी,
मरने पर उपकार हो गया

आश्चर्य वे बेटे देते,
पूर्व-पुरूष को नियमित तर्पण
नमक-तेल रोटी क्या देना,
कर न सके जो आत्म-समर्पण!

जाऊँ कहाँ, न जगह नरक में,
और स्वर्ग के द्वार न खोला!
कफ़न फाड़कर मुर्दा बोला।

10 फ़रवरी 2016

तुम क्या जानो…SADHANA VAID



तुम क्या जानो

रसोई से बैठक तक,
घर से स्कूल तक,
रामायण से अखबार तक
मैने कितनी आलोचनाओं का ज़हर पिया है
तुम क्या जानो !

करछुल से कलम तक,
बुहारी से ब्रश तक,
दहलीज से दफ्तर तक
मैंने कितने तपते रेगिस्तानों को पार किया है
तुम क्या जानो !

मेंहदी के बूटों से मकानों के नक्शों तक,
रोटी पर घूमते बेलन से कम्प्यूटर के बटन तक,
बच्चों के गड़ूलों से हवाई जहाज़ की कॉकपिट तक
मैंने कितनी चुनौतियों का सामना किया है
तुम क्या जानो !

जच्चा सोहर से जाज़ तक,
बन्ना बन्नी से पॉप तक,
कत्थक से रॉक तक मैंने कितनी वर्जनाओं के थपेड़ों को झेला है
तुम क्या जानोसाधना वैद

9 फ़रवरी 2016

जब तक साँसों का बंधन है जीते जाओ सोचो मत... निदा फ़ाज़ली

1...

जीवन क्या है चलता फिरता एक खिलौना है
दो आँखों में एक से हँसना एक से रोना है
जो जी चाहे वो मिल जाये कब ऐसा होता है
हर जीवन जीवन जीने का समझौता है
अब तक जो होता आया है वो ही होना है
रात अँधेरी भोर सुहानी यही ज़माना है
हर चादर में दुख का ताना सुख का बाना है
आती साँस को पाना जाती साँस को खोना है

2....
कभी कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है
हमसे पूछो इज़्ज़त वालों की इज़्ज़त का हाल कभी
हमने भी इस शहर में रह कर थोड़ा नाम कमाया है
उससे बिछड़े बरसों बीते लेकिन आज न जाने क्यों
आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारण धमकाया है
कोई मिला तो हाथ मिलाया कहीं गए तो बातें की
घर से बाहर जब भी निकले दिन भर बोझ उठाया है

3....
तुम ये कैसे जुदा हो गये
हर तरफ़ हर जगह हो गये
अपना चेहरा न बदला गया
आईने से ख़फ़ा हो गये
जाने वाले गये भी कहाँ
चाँद सूरज घटा हो गये
बेवफ़ा तो न वो थे न हम
यूँ हुआ बस जुदा हो गये
आदमी बनना आसाँ न था
शेख़ जी आप हो गये

4...
ये ज़िन्दगी
आज जो तुम्हारे
बदन की छोटी-बड़ी नसों में
मचल रही है
तुम्हारे पैरों से चल रही है
तुम्हारी आवाज़ में ग़ले से निकल रही है
तुम्हारे लफ़्ज़ों में ढल रही है
ये ज़िन्दगी
जाने कितनी सदियों से
यूँ ही शक्लें
बदल रही है
बदलती शक्लों
बदलते जिस्मों में
चलता-फिरता ये इक शरारा
जो इस घड़ी
नाम है तुम्हारा
इसी से सारी चहल-पहल है
इसी से रोशन है हर नज़ारा
सितारे तोड़ो या घर बसाओ
क़लम उठाओ या सर झुकाओ
तुम्हारी आँखों की रोशनी तक
है खेल सारा
ये खेल होगा नहीं दुबारा
ये खेल होगा नहीं दुबारा
5...
कठ-पुतली है या जीवन है जीते जाओ सोचो मत
सोच से ही सारी उलझन है जीते जाओ सोचो मत.
लिखा हुआ किरदार कहानी में ही चलता फिरता है
कभी है दूरी कभी मिलन है जीते जाओ सोचो मत.
नाच सको तो नाचो जब थक जाओ तो आराम करो
टेढ़ा क्यूँ घर का आँगन है जीते जाओ सोचो मत.
हर मज़हब का एक ही कहना जैसा मालिक रक्खे रहना
जब तक साँसों का बंधन है जीते जाओ सोचो मत.
घूम रहे हैं बाज़ारों में सरमायों के आतिश-दान
किस भट्टी में कौन ईंधन है जीते जाओ सोचो मत.



29 जनवरी 2016

अन्धेरी निशा में नदी के किनारे / सरयू सिंह 'सुन्दर'

अन्धेरी निशा में नदी के किनारे
धधक कर किसी की चिता जल रही है ।

धरा रो रही है, बिलखती दिशाएँ,
असह वेदना ले गगन रो रहा है,
किसी की अधूरी कहानी सिसकती,
कि उजड़ा किसी का चमन रो रहा है,

घनेरी नशा में न जलते सितारे,
बिलखकर किसी की चिता जल रही है ।

चिता पर किसी की उजड़ती निशानी,
चिता पर किसी की धधकती जवानी,
किसी की सुलगती छटा जा रही है,
चिता पर किसी की सुलगती रवानी,

क्षणिक मोह-ममता जगत को बिसारे,
लहक कर किसी की चिता जल रही है ।

चिता पर किसी का मधुर प्यार जलता,
किसी का विकल प्राण, श्रृंगार जलता,
सुहागिन की सुषमा जली जा रही है,
अभागिन बनी जो कि संसार जलता,

नदी पार तृण पर अनल के सहारे
सिसक कर किसी की चिता जल रही है ।

अकेला चला था जगत के सफ़र में,
चला जा रहा है, जगत से अकेला,
क्षणिक दो घड़ी के लिए जग तमाशा,
क्षणिक मोह-ममता, जगत का झमेला,

लुटी जा रही हैं किसी की बहारें,
दहक कर किसी की चिता जल रही है ।

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गीत

13 जनवरी 2016

मकर संक्रांति पर नरेंद्र मोदी जी द्वारा रचित कविता














उत्सव
पतंग
मेरे लिए उर्ध्वगति का उत्सव
मेरा सूर्य की ओर प्रयाण।
पतंग
मेरे जन्म-जन्मांतर का वैभव,
मेरी डोर मेरे हाथ में
पदचिह्न पृथ्वी पर,
आकाश में विहंगम दृश्य।
मेरी पतंग
अनेक पतंगों के बीच...
मेरी पतंग उलझती नहीं,
वृक्षों की डालियों में फंसती नहीं।
पतंग
मानो मेरा गायत्री मंत्र।
धनवान हो या रंक,
सभी को कटी पतंग एकत्र करने में आनंद आता है,
बहुत ही अनोखा आनंद।
कटी पतंग के पास
आकाश का अनुभव है,
हवा की गति और दिशा का ज्ञान है।
स्वयं एक बार ऊंचाई तक गई है,
वहां कुछ क्षण रुकी है।
पतंग
मेरा सूर्य की ओर प्रयाण,
पतंग का जीवन उसकी डोर में है।
पतंग का आराध्य(शिव) व्योम(आकाश) में,
पतंग की डोर मेरे हाथ में,
मेरी डोर शिव जी के हाथ में।
जीवन रूपी पतंग के लिए(हवा के लिए)
शिव जी हिमालय में बैठे हैं।
पतंग के सपने(जीवन के सपने)
मानव से ऊंचे।
पतंग उड़ती है,
शिव जी के आसपास,
मनुष्य जीवन में बैठा-बैठा,
उसकी डोर को सुलझाने में लगा रहता है।

First Published: Tuesday, January 14, 2014 - 20:13

9 दिसंबर 2015

औरतें--रमाशंकर यादव विद्रोही



कुछ औरतों ने
अपनी इच्छा से
कुएं में कूदकर जान दी थी,
ऐसा पुलिस के रिकार्डों में दर्ज है।
और कुछ औरतें
चिता में जलकर मरी थीं,
ऐसा धर्म की किताबों में लिखा है।

मैं कवि हूं,
कर्ता हूं,
क्या जल्दी है,
मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित,
दोनों को एक ही साथ
औरतों की अदालत में तलब करूंगा,
और बीच की सारी अदालतों को
मंसूख कर दूंगा।

मैं उन दावों को भी मंसूख कर दूंगा,
जिन्हें श्रीमानों ने
औरतों और बच्चों के खिलाफ पेश किया है।
मैं उन डिग्रियों को निरस्त कर दूंगा,
जिन्हें लेकर फौजें और तुलबा चलते हैं।
मैं उन वसीयतों को खारिज कर दूंगा,
जिन्हें दुर्बल ने भुजबल के नाम किया हुआ है।

मैं उन औरतों को जो
कुएं में कूदकर या चिता में जलकर मरी हैं,
फिर से जिंदा करूंगा,
और उनके बयानों को
दुबारा कलमबंद करूंगा,
कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया!
कि कहीं कुछ बाकी तो नहीं रह गया!
कि कहीं कोई भूल तो नहीं हुई!

क्योंकि मैं उस औरत के बारे में जानता हूँ
जो अपने एक बित्ते के आंगन में
अपनी सात बित्ते की देह को
ता-जिंदगी समोए रही और
कभी भूलकर बाहर की तरफ झांका भी नहीं।
और जब वह बाहर निकली तो
औरत नहीं, उसकी लाश निकली।
जो खुले में पसर गयी है,
या मेदिनी की तरह।

एक औरत की लाश धरती माता
की तरह होती है दोस्तों!
जे खुले में फैल जाती है,
थानों से लेकर अदालतों तक।
मैं देख रहा हूं कि
जुल्म के सारे सबूतों को मिटाया जा रहा है।
चंदन चर्चित मस्तक को उठाए हुए पुरोहित,
और तमगों से लैस सीनों को फुलाए हुए सैनिक,
महाराज की जय बोल रहे हैं।
वे महाराज की जय बोल रहे हैं।
वे महाराज जो मर चुके हैं,
और महारानियां सती होने की तैयारियां कर रही हैं।
और जब महारानियां नहीं रहेंगी,
तो नौकरानियां क्या करेंगी?
इसलिए वे भी तैयारियां कर रही हैं।

मुझे महारानियों से ज्यादा चिंता
नौकरानियों की होती है,
जिनके पति जिंदा हैं और
बेचारे रो रहे हैं।
कितना खराब लगता है एक औरत को
अपने रोते हुए पति को छोड़कर मरना,
जबकि मर्दों को
रोती हुई औरतों को मारना भी
खराब नहीं लगता।
औरतें रोती जाती हैं,
मरद मारते जाते हैं।
औरतें और जोर से रोती हैं,
मरद और जोर से मारते हैं।
औरतें खूब जोर से रोती हैं,
मरद इतने जोर से मारते हैं कि वे मर जाती हैं।

इतिहास में वह पहली औरत कौन थी,
जिसे सबसे पहले जलाया गया,
मैं नहीं जानता,
लेकिन जो भी रही होगी,
मेरी मां रही होगी।
लेकिन मेरी चिंता यह है कि
भविष्य में वह आखिरी औरत कौन होगी,
जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा,
मैं नहीं जानता,
लेकिन जो भी होगी
मेरी बेटी होगी,
और मैं ये नहीं होने दूंगा।


2 नवंबर 2015

मैं कहना चाहता हूं------कुल दीप ठाकुर

मैं कहना चाहता हूं, इक बातदिवाने से,
कुछ भी हासिल न होगा, व्यर्थ में आँसु बहाने से।
उसे तुझ से प्यार होता, तेरा जीवन तबाह न करति,
पत्थर दिल नहीं पिघलते, किसी के रोने और  मिट जाने से।
सूख रहा है एक गुल, बुलबुल की याद में,
हस्ति तेरी मिट जायेगी, गुल तेरे मुर्झाने से।
शमा को तुझसे प्यार नहीं, मत जा तु उसके पास।
जलाकर राख कर देगा, कहता हूँ परवाने से।
भोली भाली एक चकोरी, चाँद को पाना चाहाति है,
दिल नहीं है चाँद के पास, क्या लाभ है उसे चाहने से।
किसी को भी इतना मत चाहो, जी न पाओ उसके बिना,
जीवन नहीं मरा करता है, किसी के दूर जाने से।

11 अगस्त 2015

शाख और पत्ता-अखिलेश...



टुटा शाख से पत्ता,
चला अपनी राह बनाने,
खुद की मेहनत से,
खुद को खुदा बनाने,
छोड़ फ़िक्र तरु की,
छोड़ यादें साथियों की,
चला पवन के साथ बतियाने,
टूट शाख से पत्ता,
चला अपनी राह बनाने|
कभी गति पवन ने दी,
कभी साथ मिला जलधारा का,
कभी स्थिरता को पाया,
कभी वेग था विचारों सा,
अपनी गति देख कर,
लगा था वो इठलाने,
टूट शाख से पत्ता ,
चला अपनी राह बनाने|
राहे आसाँ थी नहीं,
प्रकति पर निर्भर गति,
भय हमराही पशुओ से ,
पहुचा दे ना कोई क्षति,
मुश्किल राहों में ठहर,
जाने का डर अब,
था लगा सताने,
टूट शाख से पत्ता,
चला अपनी राह बनाने|
जीवन कितना था बाकि,
कितनी राहे थी बाकि,
बढ़ना था तीव्र गति से,
पर था कहाँ समय साथी,
समय चक्र तेज चलने लगा,
करीब अंत लगा था आने,
टूट शाख से पत्ता ,
चला अपनी राह बनाने|
अंत नियति है सबकी,
सभी को लगाया उसने गले,
माटी से मिल माटी में खो गया,
आज फिर शाख पर ,
देखो एक अंकुर उभर रहा,
बन अंकुर देखो फिर
शाख से जुड़ गया वो,
जो टूट शाख से,
चला था अपनी राह बनाने|
साभार...
Akhilesh जी के ब्लौग से...

17 मई 2015

मधु शाला 5 दोहो मे-जी पी पारीक



==============

मधुशाला मे शोर है, गणिका गाये राग!!
जाम भरा ले हाथ मे, पीने से अनुराग!!1!!

चषक लिये है साकिया, इतराती है चाल!!
सब पीकर है नाचते, ठुमकत दे दे ताल!!2!!

प्याला पीकर रस भरा, केवल रब का भान !!
लघुता या गुरूता नहि, सब मे एक ही जान !!3!!

हाला पीकर बावला, बजा रहा है गाल !!
सिर के उपर नाच रहा, स्वर्ण चषक ले काल !!4!!

मित् वत जिनको देखता, घट मे खोटे जान !!
प्याले से प्याला मिला, असल मीत है मान !!5!!

18 नवंबर 2014

अटक गया विचार-- बृजेश नीरज

माथे पर सलवटें;

आसमान पर जैसे

बादल का टुकड़ा थम गया हो;

समुद्र में

लहरें चलते रूक गयीं हों,

कोई ख्याल आकर अटक गया।

धकियाने की कोशिश बेकार,

सिर झटकने से भी

निशान नहीं जाते।

सावन के बादलों की तरह

घुमड़कर अटक जाता है

वहीं

उसी जगह

उसी बिन्दु पर।

काफी वजनी है;

सिर भारी हो चला

आंखें थक गईं,

पलकें बोझल।

सहा नहीं जाता

इस विचार का वजन।

आदत नहीं रही

इतना बोझ उठाने की;

अब तो घर का राशन भी

भार में इतना नहीं होता कि

आदत बनी रहे।

बहुत देर तक अटका रहा;

वह कोई तनख्वाह तो नहीं

झट खतम हो जाए।

अभी भी अटका है वहीं

सिर को भारी करता।

बहुत देर से कुछ नहीं सोचा।

सोचते हैं भी कहां

सोचते तो क्यों अटकता।

इस न सोचने,

न बोलने के कारण ही

अटक गयी है जिंदगी।

तालाब में फेंकी गई पालीथीन की तरह

तैर रहा है विचार

दिमाग में

सोच की अवरूद्ध धारा में मंडराता।

अब मजबूर हूं सोचने को

कैसे बहे धारा अविरल

फिर न अटके

सिर बोझिल करने वाला

कोई विचार।

- बृजेश नीरज

4 अक्टूबर 2014

      साथी था अब अजनबी है-सुरेन्द्र भुटानी




मुल्क का मुल्क ही  अपनी यादाश्त खो बैठा है यहां
अब जो खिलाडी आया है वो अपना खेल दिखायेगा
तुम भी अपने दिलो-दिमाग़ की खिड़कियां बंद कर लो
वक़्त नहीं वक़्त का साया है तुम से क्या मेल बढ़ायेगा
ये मौसमी ना'रे हैं इनकी भी इक मीयाद होगी आखिर
फिलहाल साँसों के सिवा सब हमसफ़र तो छूट गये 
हर सुबह बदलता रहेगा ये ज़माना नित नए रंग अपने 
शोरीशे-हस्ती का इक  बहाना है सब रहबर तो लूट  गये
ले उडा  तमाम नींदें ,क्या ख़्वाब की ता'बीर देखोगे
सर-चश्मा-ए -ज़ुल्मत में अब  खुर्शीद की आमद क्या
रुदादे -ग़मे-वफ़ा से  लोगों के अफ़साने जुड़ते जायेंगे
झूठी चमक की शोहरत में अब  हुस्ने-दीद की आमद क्या
एक अजब सा खौफ बना रहेगा, अब ऐसी ही  दुश्वारी है
नीम सी कड़वी  बातों पे तुम्हे  अपने तंज़ करते रहना है
तुम अपने हो कर फिर अजनबी बने, ये रीत तो पुरानी है
गल्त वक़्त की मुलाक़ातों पे तुम्हे अपने तंज़ करते रहना है

14 अगस्त 2013

15 अगस्त...

मैं 15 अगस्त हूं कहता हूं तुम से, सोचो  हम क्यों गुलाम हुए,
वो सब कुछ हम फिर न करें, जिस कारण हम गुमनाम हुए।
मैंने खुद रोते देखा था,  अपनी प्यारी भारत मां को,
राम कृष्न के वंशज होकर भी,  हम जग में  बदनाम हुए।
हर हिन्दूस्तानी का जीवन था केवल,  पिंजरे में बन्द पंछी सा,
नारी का अस्तित्व, पुरूष का पौरुष, हमारे  ख्वाब तक भी  निलाम हुए।
कुछ महापुरूषों ने सपना देखा, खुशहाल स्वतंत्र भारत का,
इस सपने को पूरा करने, कयी देश भक्त महान हुए।
मैं साक्षी हूं हर कुर्वानी  का, मैंने हर शहीद  पर सुमन चढ़ाये,
शव गिनते गिनते थक गया था,  असंख्य वीर कुर्वान हुए।
मैं 15 अगस्त करता हूं आवाहन, भ्रष्टाचार को जड़ से  मिटाओ,
देखो हमारी उन पुरानी भूलों के, क्या क्या  भयानक परिणाम हुए।