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9 अगस्त 2016

हिरोशिमा की पीड़ा / अटल बिहारी वाजपेयी

किसी रात को
मेरी नींद चानक उचट जाती है
आँख खुल जाती है
मैं सोचने लगता हूँ कि
जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का
आविष्कार किया था
वे हिरोशिमा-नागासाकी के भीषण
नरसंहार के समाचार सुनकर
रात को कैसे सोए होंगे?
क्या उन्हें एक क्षण के लिए सही
ये अनुभूति नहीं हुई कि
उनके हाथों जो कुछ हुआ
अच्छा नहीं हुआ!

यदि हुई, तो वक़्त उन्हें कटघरे में खड़ा नहीं करेगा
किन्तु यदि नहीं हुई तो इतिहास उन्हें
कभी माफ़ नहीं करेगा!



12 अक्टूबर 2013

दो नयन मेरी प्रतीक्षा में खड़े हैं

प्रस्तुत है श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की यह कविता जो मुझे बहुत प्रिय है .............

पंथ जीवन का चुनौती दे रहा है हर कदम पर ,
आखिरी मंजिल नहीं होती कहीं भी दृष्टिगोचर ,
धूलि से लद ,स्वेद से सिंच, हो गई है देह  भारी,
कौन - सा विश्वास मुझको खींचता जाता निरंतर !

पंथ क्या, पथ की थकन क्या
स्वेद कण क्या,
दो नयन मेरी प्रतीक्षा में खड़े हैं !

एक भी संदेश आशा का नहीं देते सितारे ,
प्रकृति ने मंगल शकुन - पथ में नहीं मेरे संवारे ,
विश्व का उत्साहवर्धक शब्द भी  मैंने सुना कब ,
किन्तु बढ़ता जा रहा हूँ लक्ष्य पर किसके सहारे !

विश्व की अवहेलना क्या ,
अपशकुन  क्या, दो नयन मेरी प्रतीक्षा में खड़े हैं !

चल रहा है पर पहुंचना लक्ष्य पर इसका अनिश्चित ,
कर्म कर भी कर्मफल से  यदि  रहा यह पथ वंचित,
विश्व तो उस पर हंसेगा ,खूब भूला ,खूब भटका !
किन्तु  गा  यह पंक्तियाँ दो वह करेगा धैर्य संचित !

व्यर्थ जीवन ,व्यर्थ जीवन
की लगन क्या ,
दो नयन मेरी प्रतीक्षा में खड़े हैं ?

अब नहीं उस पार का भी भय मुझे  कुछ सताता ,
उस तरफ के लोक से भी जुड़ चुका है एक नाता ,
मैं भी उसे भूला नहीं वह भी नहीं भूली मुझे भी ,
मृत्यु पथ पर भी बढूंगा, मोद से यह गुनगुनाता -

अंत यौवन ,अंत जीवन
का, मरण क्या

दो नयन मेरी प्रतीक्षा में खड़े हैं !

14 सितंबर 2013

मैंने जन्म नहीं मांगा था










प्रस्तुत है श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी(जो न केवल एक सफल राजनेता बल्कि सहृदय कवि भी रहे हैं ) की यह कविता……………………. ………… 

मैंने जन्म नहीं मांगा था, किन्तु
मरण की मांग करूंगा
जाने कितनी बार जिया हूँ
जाने कितनी बार मरा हूँ
जन्म - मरण के फेरे से मैं
इतना पहले नहीं डरा हूँ
अंतहीन अंधियार ,ज्योति की
कब तक और तलाश करूंगा

मैंने जन्म नहीं मांगा था, किन्तु
मरण की मांग करूंगा

बचपन ,यौवन और बुढ़ापा
कुछ दशकों में ख़तम कहानी
फिर - फिर जीना, फिर -फिर मरना
यह मजबूरी या मनमानी
पुनर्जन्म के पूर्व बसी
दुनियां का द्वाराचार करूंगा

मैंने जन्म नहीं मांगा था, किन्तु
मरण की मांग करूंगा