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7 अगस्त 2016

 तुम तक दिल के भावों को लाऊँ कैसे —--महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’ 

तुम तक दिल के भावों को लाऊँ कैसे
तुमसे उल्फ़त है ये समझाऊँ कैसे
शब्दों में जो पूछा वो तो समझा है
नज़रों का मतलब लेकिन पाऊँ कैसे
मैंने मन में शक को ना हरगिज़ पाला
दिलबर का शक ख़ारिज करवाऊँ कैसे
जीवन पथ में मिल कर हमको चलना था
आधे रस्ते से अब मुड़ जाऊँ कैसे
मैंने बंधन को कर्तव्य ख़लिश समझा
मन में दूजे को मैं बिठलाऊँ कैसे.

महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’
द्वारा एक मंच  गुगल समुह पर...
दिनांक 7 अगस्त 2016

9 फ़रवरी 2016

जब तक साँसों का बंधन है जीते जाओ सोचो मत... निदा फ़ाज़ली

1...

जीवन क्या है चलता फिरता एक खिलौना है
दो आँखों में एक से हँसना एक से रोना है
जो जी चाहे वो मिल जाये कब ऐसा होता है
हर जीवन जीवन जीने का समझौता है
अब तक जो होता आया है वो ही होना है
रात अँधेरी भोर सुहानी यही ज़माना है
हर चादर में दुख का ताना सुख का बाना है
आती साँस को पाना जाती साँस को खोना है

2....
कभी कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है
हमसे पूछो इज़्ज़त वालों की इज़्ज़त का हाल कभी
हमने भी इस शहर में रह कर थोड़ा नाम कमाया है
उससे बिछड़े बरसों बीते लेकिन आज न जाने क्यों
आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारण धमकाया है
कोई मिला तो हाथ मिलाया कहीं गए तो बातें की
घर से बाहर जब भी निकले दिन भर बोझ उठाया है

3....
तुम ये कैसे जुदा हो गये
हर तरफ़ हर जगह हो गये
अपना चेहरा न बदला गया
आईने से ख़फ़ा हो गये
जाने वाले गये भी कहाँ
चाँद सूरज घटा हो गये
बेवफ़ा तो न वो थे न हम
यूँ हुआ बस जुदा हो गये
आदमी बनना आसाँ न था
शेख़ जी आप हो गये

4...
ये ज़िन्दगी
आज जो तुम्हारे
बदन की छोटी-बड़ी नसों में
मचल रही है
तुम्हारे पैरों से चल रही है
तुम्हारी आवाज़ में ग़ले से निकल रही है
तुम्हारे लफ़्ज़ों में ढल रही है
ये ज़िन्दगी
जाने कितनी सदियों से
यूँ ही शक्लें
बदल रही है
बदलती शक्लों
बदलते जिस्मों में
चलता-फिरता ये इक शरारा
जो इस घड़ी
नाम है तुम्हारा
इसी से सारी चहल-पहल है
इसी से रोशन है हर नज़ारा
सितारे तोड़ो या घर बसाओ
क़लम उठाओ या सर झुकाओ
तुम्हारी आँखों की रोशनी तक
है खेल सारा
ये खेल होगा नहीं दुबारा
ये खेल होगा नहीं दुबारा
5...
कठ-पुतली है या जीवन है जीते जाओ सोचो मत
सोच से ही सारी उलझन है जीते जाओ सोचो मत.
लिखा हुआ किरदार कहानी में ही चलता फिरता है
कभी है दूरी कभी मिलन है जीते जाओ सोचो मत.
नाच सको तो नाचो जब थक जाओ तो आराम करो
टेढ़ा क्यूँ घर का आँगन है जीते जाओ सोचो मत.
हर मज़हब का एक ही कहना जैसा मालिक रक्खे रहना
जब तक साँसों का बंधन है जीते जाओ सोचो मत.
घूम रहे हैं बाज़ारों में सरमायों के आतिश-दान
किस भट्टी में कौन ईंधन है जीते जाओ सोचो मत.



26 अगस्त 2013

उसके बग़ैर कितने ज़माने गुज़र गए...


कुछ ख़्वाब इस तरह से जहां में बिखर गए
अहसास जिस क़द्र थे वो सारे ही मर गए

जीना मुहाल था जिसे देखे बिना कभी
उसके बग़ैर कितने ज़माने गुज़र गए

माज़ी किताब है या अरस्तु का फ़लसफ़ा
औराक़ जो पलटे तो कई पल ठहर गए

कब उम्र ने बिखेरी है राहों में कहकशां
रातें मिली स्याह, उजाले निखर गए

सहरा में ढूंढते हो घटाओं के सिलसिले
दरिया समन्दरों में ही जाकर उतर गए

कुछ कर दिखाओ, वक़्त नहीं सोचने का अब
शाम हो गई तो परिंदे भी घर गए

'फ़िरदौस' भीगने की तमन्ना ही रह गई
बादल मेरे शहर से न जाने किधर गए
-फ़िरदौस ख़ान

23 अगस्त 2013

गुलज़ार की गजलें...



1.       देखो, आहिस्ता चलो
देखो, आहिस्ता चलो, और भी आहिस्ता ज़रा
देखना, सोच-सँभल कर ज़रा पाँव रखना
ज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं
काँच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में
ख़्वाब टूटे न कोई, जाग न जाये देखो
जाग जायेगा कोई ख़्वाब तो मर जायेगा |
2.       मैं सिगारेट तो नही पिता

 मैं सिगारेट तो नही पिता
पर हर आनेवेलेसे पुँछ लेता हूँ
माचिस हैं?’
बहोत कुछ है जिसे में
जला देना चाहता हूँ...
मगर हिम्मत नही होती

3.       जलते शहर में बैठा शायर
 जलते शहर में बैठा शायर
इससे ज्यादा करे भी क्या?
अल्फ़ाज़ से जखम नही भरते
नज़्मो से खराशे नही भरती

4.       नज़्म उलझी हुई है सीने में
 नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर
उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं
कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा
बस तेरा नाम ही मुकम्मल है
इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी