ब्लौग सेतु....

16 सितंबर 2017

खाता नम्बर


ग़ौर से देखो गुलशन  में 

बयाबान का साया है ,

ज़ाहिर-सी बात है 

आज फ़ज़ा ने बताया है। 



इक  दिन  मदहोश  हवाऐं 

कानों  में  कहती  गुज़र  गयीं,

 उम्मीद-ओ-ख़्वाब  का  दिया 


हमने  ही  बुझाया  है।   




आपने अपना खाता नम्बर  

विश्वास  में  किसी  को  बताया है

तभी तो तबादला होकर दर्द 

आपके हिस्से में आया है।   



दर्द अंगड़ाई ले लेकर  

जाग उठता है पहर-दर-पहर 

कुछ ब्याज का हिस्सा भी 

बरबस आकर समाया है। 



आपके तबस्सुम में रहे 

वो  रंग-ओ-शोख़ियां  अब कहाँ ?

उदास तबियत का 

दिन-ओ-दिन  भारी हुआ सरमाया है। 



बिना अनुमति के खाते में 

न कुछ जोड़ा जाए 

अब जाकर राज़दार का पता 

बैंक से की इल्तिजा में बताया है।   

#रवीन्द्र सिंह यादव

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी रचना बहुत ही सराहनीय है ,शुभकामनायें ,आभार

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    1. हार्दिक आभार आदरणीय ध्रुव जी रचना की सराहना के लिए।

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द" में सोमवार 18 सितंबर 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com आप सादर आमंत्रित हैं ,धन्यवाद! "एकलव्य"

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    1. हार्दिक आभार आदरणीय ध्रुव जी रचना को मान देने और पाँच लिंकों का आनन्द में शामिल करने के लिए के लिए।

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (18-09-2015) को "देवपूजन के लिए सजने लगी हैं थालियाँ" (चर्चा अंक 2731) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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    1. हार्दिक आभार आदरणीय शास्त्री जी रचना को चर्चामंच के ज़रिये अधिक से अधिक सुधि पाठकों तक पहुँचाने के लिए।

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  4. वाह!!
    बहुत सुन्दर... सार्थक अभिव्यक्ति...
    लाजवाब...
    दर्द अंगड़ाई ले लेकर

    जाग उठता है पहर-दर-पहर

    कुछ ब्याज का हिस्सा भी

    बरबस आकर समाया है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह ! क्या बात है ! बेहतरीन प्रस्तुति आदरणीय ! बहुत खूब ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. इक दिन मदहोश हवाऐं
    कानों में कहती गुज़र गयीं,
    उम्मीद-ओ-ख़्वाब का दिया
    हमने ही बुझाया है।

    बेमिसाल बेमिसाल रविन्द्र जी। बेहद दिलकश। विरल दृष्टि। समृद्ध चिंतन। सादर

    उत्तर देंहटाएं

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