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1 जनवरी 2018

नव वर्ष तुम्हारा अभिनंदन---डॉ.जगदीश व्योम  

आमों पर खूब बौर आए
भँवरों की टोली बौराए
बगिया की अमराई में फिर
कोकिल पंचम स्वर में गाए।
फिर उठें गंध के गुब्बारे
फिर महके अपना चंदन वन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनंदन

गौरैया बिना डरे आए
घर में घोंसला बना जाए
छत की मुंडेर पर बैठ काग
कह काँव-काँव फिर उड़ जाए
मन में मिसिरी घुलती जाए
सबके आँगन हों सुखद सगुन।
नव वर्ष तुम्हारा अभिनंदन

बच्चों से छिने नहीं बचपन
वृद्धों का ऊबे कभी न मन
हो साथ जोश के होश सदा
मर्यादित बने रहें जन मन
ऐसे दुख कभी नहीं आएँ
बदरंग हो जाए घर आँगन।
नव वर्ष तुम्हारा अभिनंदन

घाटी में फिर से फूल खिलें
फिर रुके शिकारे तैर चलें
बह उठे प्रेम की मंदाकिनी
हिमशिखर हिमालय से पिघलें।
सोनी मचले महिवाल चले
राँझे की हीर करे नर्तन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनंदन

विज्ञान ज्ञान के छुए शिखर
पर चले शांति के ही पथ पर
हिंदी भाषा के पंख लगा
कंप्यूटर जी पहुँचें घर-घर।
वह देश रहे खुशहाल 'व्योम'
धरती पर जहाँ प्रवासी जन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनंदन

डॉ.जगदीश व्योम  




2 टिप्‍पणियां:

  1. उत्कृष्ट व सराहनीय प्रस्तुति.........
    नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाओ सहित नई पोस्ट पर आपका इंतजार .....

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (02-01-2018) को नववर्ष "भारतमाता का अभिनन्दन"; चर्चा मंच 2836

    पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    नववर्ष 2018 की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं

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