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22 जनवरी 2018

मधुमास के प्रथम दिवस में......पंकज भूषण पाठक "प्रियम"


मधुमास के प्रथम दिवस में
है प्रियम का ये अभिनन्दन प्रिये
पूर्णचन्द्र की क्षीण कला सी
अम्बर को छूती चपला सी
लहराई यूँ कनक लता सी
धरा अम्बर का है ये मिलन प्रिये।
अंतर की मधुमयी विकलता
अधरों में छलकी थिरकन
सांसों के मनमोहक सुर में
पलकों का निश्चल आमन्त्रण प्रिये।
याद कर रही अलस सुबह में
रतजगी पलको का स्पंदन
द्वार देहली खड़ी निरखती
भ्रमरों का मादक अनुगूँजन प्रिये।
अरे!वही तो फिर फिर आती
विम्बाधर में मादक थिरकन
अधखुले अधरों पर मानो
जलगुलाब की आयी छलकन प्रिये।
मृदु लालित्य बासन्ती मलयन
की हल्की हल्की सी सिहरन
स्वप्निल मादक नयनों से
मन्दिर माधवी का अभिनन्दन प्रिये।
नवकलिओं के स्पर्श को
सुनो मधुकर का अनुगूँजन
धूप में नहायी पहली किरण
कर रही कैसी प्रणय निवेदन प्रिये।
नींद से भारी अलसायी
यौवन की खुमारी छायी
बोझिल पलके बार बार
किस कदर भेदती उर निर्मम प्रिये।
बौराये आम्र तरुओं से
टपकते रसमंजरी से
भीगी रसा मदहोश
चला मरुत करने आलिंगन प्रिये।
मतवाली कोयल काली
पुष्पबोझ में झुकी डाली
बाल मन तरंगों वाली
मन माधव का अभिनन्दन प्रिये।
इस मधुरिम बेला में
न रूठो मेरी प्रियतमे
आओ करीब बाहों में
भर करूँ जी भर आलिंगन प्रिये।
-पंकज भूषण पाठक "प्रियम"

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (23-01-2018) को "जीवित हुआ बसन्त" (चर्चा अंक-2857) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    बसन्तपंचमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बसंत का सुखद और प्रेम भरा आगमन
    बहुत सुंदर रचना
    बधाई
    सादर

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