ब्लौग सेतु....

27 जनवरी 2018

तुम तितली बन जाओ.....पंकज भूषण पाठक"प्रियम"

चली वासन्ती मलयन
भ्रमरों का ये अनुगूंजन है
नवकलियों का यौवन
देता निश्छल आमन्त्रण है

कामदेव का रति से
चला प्रणय अनुराग है
बावली बन फिर रही
तितली बैठी पराग है।

वासन्ती रंग रँगी वसुधा
फिजां में छाई बहार है।
फूलों का ओढ़ चादर
प्रेमरस भरा श्रृंगार है।

रस से भीगी है रसा जो
बनी हर कली शबाब है
तुम तितली बन जाओ
 बने हम तेरा गुलाब हैं।

फूलों से तितली का जीवन
तितली फूलों का श्रृंगार है
तूम पी लो सारा रस मेरा
हम मुरझाने को तैयार हैं।
©पंकज भूषण पाठक"प्रियम"

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (28-01-2017) को "आया बसंत" (चर्चा अंक-2862) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    उत्तर
    1. जी बहुत आभार आपका। इस कविता का परिमार्जित रूप ब्लॉग में है।

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    2. जी बहुत आभार आपका। इस कविता का परिमार्जित रूप ब्लॉग में है।

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  2. आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 29 जनवरी 2018 को साझा की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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