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23 अगस्त 2017

गुरु


डॉक्टर  को

उसके  गुरु

सिखाया  करते  थे-

"मौत से घृणा करो"

वे  आज

विश्वास के क़ातिल /

मौत के

सौदाग़र हो गए

पैसे के भारी

तलबग़ार हो गए।




नेता   को

उसके    गुरु

सिखाया करते थे-

"राजनीति का ध्येय

समाज-कल्याण है

उसूलों पर खरे उतरना "

वे  आज

लाशों पर

रोटियां सेकने 

माहौल बिगाड़ने  में

माहिर हो गए

भ्रष्टाचारी / अवसरवादी  दुनिया के 

मुसाफ़िर  हो  गए।




शिक्षक  को

उसके गुरु


सिखाया करते थे-

"चरित्र-निर्माण ही

राष्ट्र-निर्माण है"

वे  आज 

वैचारिक दरिद्रता के

क़ायल   हो  गए

अपनी ही शिक्षा के

तीरों से घायल हो गए ।




संत को 

उसके गुरु 


सिखाया करते थे -


"मोह माया से दूर रहो 


आध्यात्मिक ज्ञान से 


समाज-सुधार करो"


वे आज 


बड़े व्यापारी हो गए 


भोली जनता की 


गाढ़ी कमाई खाकर 


समाज पर 


बोझ भारी हो गए। 




कलाकार को 

उसके गुरु ने 

यह कहते हुए तराशा -

"कला का मक़सद 

सामजिक-चेतना को 

उभारना है

दरबारी कृपामंडल में 

चमकना नहीं 

रूह को वीरान 

होने देना नहीं

जितना तपोगे 

उतना निखरोगे "

वे आज 

भोगवादी विचार के  

शिकार हो 

विलासता में सिमट गये 

सरकारी ओहदे /अवार्ड / अनुदान की 

परिधि में 

कलात्मक -विद्रोह से 

महरूम हो 

सत्ता के हाथों 

लुट-पिट गये।  





नैतिक पतन के दौर में


हम अपनी ग़लतियों 


के  लिए  


प्रायश्चित नहीं करते 


न  ही कभी


अपने भीतर झाँकते


परिणाम सामने हैं


दोषारोपण के और कितने


मील  के पत्थर गाढ़ने हैं ?


सामाजिक मूल्य गहरी नींद सो गए. ......!


गुरु क्यों अब अप्रासंगिक हो गए ?


#रवीन्द्र सिंह यादव