ब्लौग सेतु....

20 मई 2014

धुआँ बन मैं संग उड़ने को तैयार था

ये हवा जो तेरी खुशबू बाँटने को तैयार होती
धुआँ बन मैं संग उड़ने को तैयार था

बादलों में बनते बिगड़ते हर चेहरे से लगा
जो तेरा होता तो मैं रंग भरने को तैयार था

सुनहरी तितली कलाबाजी करते आयी मेरे सामने
जो तू सीखती तो मै उसे पकड़ने को तैयार था

इस नदी में गहराई तो है लेकिन वैसी नही
जो तेरी खामोशी होती तो मै डूबने को तैयार था

उन यादों में अक्सर मिल जाया करती हो तुम
जो तू रोक लेती तो मैं वहीँ रह्ने को तैयार था

जो जानता इतनी हसीन होगी तसव्वूर मेँ रात
दुनियादारी भूल मैं खयालों मेँ खोने को तैयार था

8 टिप्‍पणियां:

  1. नयी पुरानी हलचल का प्रयास है कि इस सुंदर रचना को अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    जिससे रचना का संदेश सभी तक पहुंचे... इसी लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 22/05/2014 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है...हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...

    [चर्चाकार का नैतिक करतव्य है कि किसी की रचना लिंक करने से पूर्व वह उस रचना के रचनाकार को इस की सूचना अवश्य दे...]
    सादर...
    चर्चाकार कुलदीप ठाकुर
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  2. यादों में तो अक्सर सभी रुके रहते हैं ...
    लाजवाब शेर हैं ...

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  3. बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैं...

    उत्तर देंहटाएं

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