ब्लौग सेतु....

2 सितंबर 2014

हो सके तो किसी का सहारा बनो



राजेश त्रिपाठी

जरूरी नहीं कि तुम आसमां का सितारा बनो।
अगर हो सके तो किसी का सहारा बनो।।

कभी-कभी मझधार में डुबो देती है कश्ती भी।
हो सके तो किसी डूबते का किनारा बनो।।

जन्म आदम का मिलता है भाग्य से।
जरूरी नहीं कि मनुज दोबारा बनो।।

उपकार जितना बन सके करते चलो।
हो सके तो दुखियों की आंख का तारा बनो।।

जो मजलूम हैं महरूम हैं इस दुनिया में।
उनके हक की आवाज, उनका नारा बनो।।

रास्ते खुद मंजिलों तक ले जायेंगे तुमको।
हौसला रखो बुलंद न तुम नाकारा बनो।।

मतलबपरस्त हो गयी है अब दुनिया।
सोचो-समझो फिर किसी का सहारा बनो।।

प्यार इक व्यापार बन गया है आजकल।
इससे बच कर रहो या फिर आवारा बनो।।

अब यहां हवन करते भी हाथ जलते हैं।
जांचो-पऱखो फिर किसी का प्यारा बनो।।

तकदीर ऊपर से लिख कर नहीं आती।
अपनी तकदीर के बादशाह, खुदारा बनो।।

7 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 04/09/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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    1. धन्यवाद कुलदीप जी, आपका यह प्रोत्साहन और कुछ नया बेहतर लिखने की प्रेरणा देगा।

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  2. बढिय़ा पोस्ट। बार-बार पढऩे को जी चाह रहा है।

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    1. संजय जी धन्यवाद। आप जैसे सुधीजनों की सराहना ही हमारे लेखन के लिए आक्सीजन जुटाती है। ऐसे ही अपनी मेहरबानियां बरसाते रहिएगा, हौसला बढ़ता है।

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  3. उत्तर
    1. शास्त्री जी प्रणाम, धन्यवाद। अपने आशीष ऐसे ही बनाये रखिएगा। आपके आशीष की बांह थाम कर ही हमें आगे बढना है। प्रोत्साबित करने के लिए धन्यवाद।

      हटाएं
  4. तकदीर ऊपर से लिख कर नहीं आती।
    अपनी तकदीर के बादशाह, खुदारा बनो।।
    ...वाह..बहुत सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति...

    उत्तर देंहटाएं

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