ब्लौग सेतु....

26 फ़रवरी 2016

मुस्कराना आ गया (ग़ज़ल)

                                                                                   
तुझ  से  जो  नज़र  मिली  
तो  मुस्कराना    गया 
तुम्हारी जुल्फ उडी जो हवा में 
तो मौसम सुहाना आ गया 
खबर नहीं थी कि इक दिन 
इस दिल की ये आरज़ू पूरी होगी 
उमीदों  का  सवेरा  होगा 
और हर शाम सिन्दूरी होगी 
सुर अपने आप जुड़ने  लगे  
और  मुझे  गाना    गया 
तुझ  से  जो  नज़र  मिली  
तो  मुस्कराना    गया 
तुम्हारी पायल की छम-छम पर 
दिल मेरा अब नाच  उठा  है 
हसरतों  के  दरिया  में  अब 
उफान सा कुछ आ चुका  है 
भंवर  के  बीच फंसी  नाव 
का अब ठिकाना  आ गया 
तुझ  से  जो  नज़र  मिली  
तो  मुस्कराना    गया 
तेरे  बदन  की  खुशबु 
हवाओं में जो मिल गयी 
भटकते  हुए  मुसाफिर  को 
खोयी हुई मंजिल अब मिल गयी 
तुम आई तो इस गरीब के पास 
बादशाहों का खज़ाना आ गया 
तुझ  से  जो  नज़र  मिली  
तो  मुस्कराना    गया 
तेरे होंठो की लाली को देख 
फूल भी खिलना भूल  गए 
गुजरी थी जो उम्र तेरे  बिन 
जिंदगी क वो दिन फजूल गए 
ये तेरी नज़र का ही कमाल है 
कि मुसाफिर को मंजिल पाना आ गया 
तुझ  से  जो  नज़र  मिली  
तो  मुस्कराना    गया 

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (27-02-2016) को "नमस्कार का चमत्कार" (चर्चा अंक-2265) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह..
    मुस्करवा दिया न
    आज नहीं मुस्कराऊँगी सोची थी मैं
    सादर

    उत्तर देंहटाएं

स्वागत है आप का इस ब्लौग पर, ये रचना कैसी लगी? टिप्पणी द्वारा अवगत कराएं...