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16 दिसंबर 2017

नयी दुनिया


न  भूले  तुम , न  भूले  हम 
मोहब्बत किसी की न थी कम 
दुनिया के झूठे रीति - रिवाजो ने 
धर्म से निकले अल्फाजों ने 
इस जहाँ से हमें मिटा दिया 
उसे दफनाया,  मुझे जला दिया 
जिंदगी की बेवफाई समझ में आई 
दी जाती जहाँ धर्मो की दुहाई 
अजीब है दुनिया का  कायदा 
खुदा  भी  बांटा  आधा  आधा 
लेकिन हम मर कर भी जिन्दा है 
खुले आस्मां के आज़ाद परिंदा  है 
जहाँ एक धरती एक है आसमान 
नहीं जहाँ धर्मो  के हैं निशान 
मस्जिद भी मेरी मंदिर भी  मेरा 
अब हर घर पर है अपना बसेरा 
खुश हैं इस दुनिया अंजान में 
नहीं उलझता कोई गीता -कुरान में 
सुर नहीं था जीवन के तरानों में 
अपनापन मिला जाकर बेगानो में 
बादलों के बीच लगता फेरा अपना 
हर सांझ अपनी हर सवेरा अपना 
अब न कोई गम, न कोई सितम 
नयी दुनिया का एक ही नियम 
न  भूले  तुम , न  भूले  हम 
मोहब्बत किसी की न थी कम 
हितेश कुमार शर्मा 

11 नवंबर 2017

जिंदगी का मान न कर

बड़ी ख़ुशी के लिए छोटी ख़ुशी को कुर्बान न कर 
खुदा के हसीं लम्हो का तू यूं अपमान न कर 
कतरा-कतरा मिट जाएगी तेरी जिंदगी यूं ही 
जन्नत जमीं पर है तेरी ,काबू में आसमान न कर  
समेट ले हर हसीं लम्हे को तू दामन में 
पहले ही देर है अब तू सुबह से शाम न कर 
धुलने दे दिल के जज़्बातों को किसी के आंसुओं से 
बेवजह यूं ही तू अपने पराये की पहचान न कर 
इन बेवफा साँसों का पल भर का भी भरोसा नहीं 
तू यूं ही सालों का इकठा सामान न कर 
 जहाँ जीत कर भी हासिल क्या हुआ सिकंदर को 
मौत साथ है तेरे तू इस जिंदगी का मान न कर 
तेरा ये ठिकाना कल किसी और का घर होगा हितेश 
जिंदगी की चाह में तू मौत को यूं बदनाम न कर

24 जून 2017

अंतिम अनुभव

उम्र  के  अंतिम  पड़ाव  पर 
सुध  बुध   भी   खो  गयी 
बंद कमरे में एक छोटी सी खिड़की 
मेरी  सारी  दुनिया  हो  गयी 
जो  मुझे  साँझ  और  सवेरे   
 से  परिचित  करवाती  थी  
झरोखे से आती सूरज की रौशनी 
सिर्फ एक कोने तक आती  थी 
ये जर्जर शरीर अपनी ही हडियों का 
 बोझ  भी  नहीं  उठा  पाता  था 
तन्हाई अब सिर्फ साथी थी  अपनी 
इसी से अपने दिल को बहलाता था 
जिंदगी का सफर जब शुरू हुआ था 
तब  साथ  में  इक  मेला  था 
मगर  अब परिवार के बीच  भी 
मैं  बिलकुल  अकेला  था 
मुठी  भर  दवाइयां  ही 
अब  आगे  की सच्ची साथी थी 
अंतिम  अनुभव  में ये  सीखा 
कि ये ही अंत तक साथ निभाती थी 
अगली  सुबह  ऐसा  लगा  जैसे 
मैं  हवा  में  उड़  रहा  था 
मेरा शरीर अंतिम सफर के  लिए 
चार कन्धों पर आगे बढ़ रहा था 
उस  टूटे  हुए  पिंजरे  से  
अब  पंछी  आज़ाद  हो  चुका  था 
काफी  इंतज़ार के बाद ही सही 
इक नए सफर का आगाज़ हो चुका था 

7 मई 2017

उस से हमें क्या ( व्यंग)

अपने खून से करते जो वतन की 
हिफाजत तो उस से  हमें  क्या 
मिलती तुम्हे गोली  ,पत्थरों  से 
क़यामत तो उस  से  हमें  क्या 
झेली होगी तुमने जो दुश्मन की  
गोलियां  अपने  सीने  पर 
कहते  होंगे  कोई  उसे  भी 
शहादत तो उस  से  हमें  क्या 
देशप्रेम का जज्बा अगर तुम्हारे 
अंदर  बे  वजह   भरा  यूँ ही 
आपका परिवार देता है इसकी 
इज़्ज़ाजत तो उस से हमें  क्या 
अपना खुदा तो मंदिर मस्जिद 
में कहीं छिपा बैठा  है कोने में
वतन की हिफाजत को तुम कहते हो 
इब्बादत तो उस से हमें  क्या 
अपनी  नई  नवेली  दुल्हन के  
हसींन  अरमानो   की  जगह 
तुम ने   अगर  वतन  से  है  
मोहब्बत तो उसे  से  हमें  क्या 
तुम्हारी  जान  की  कीमत  कोई 
चुका  न  सका  इस  ज़माने  में 
अगर  इस  बात  से  तुम्हे  है  
शिकायत तो  उस  से  हमें  क्या 
वतन की मिटटी को अपने खून से 
सींच  कर  तुम  विदा  हुए  जो 
होगी तुम्हारी अर्थी पर फूलों की 
सजावट तो उस  से  हमें  क्या 

13 फ़रवरी 2017

सफलता की बुनियाद

क्या हुआ जो तेरे पथ में शूल  हैं 
क्या हुआ जो समय  प्रतिकूल  है 
वक़्त  की  उलटी  हवाओं  में 
काली और घनघोर  घटाओं  में 
कर्मो  की  बुनियाद  पर  
सफलता के महल  बनाता  चल 
मायूसी  की  काली  रातों  में  
ख़ुशी  के  दिए  जलाता  चल 
छोटे  छोटे  लक्ष्य  जोड़  कर 
विशाल कल का  निर्माण  कर 
सूखे पत्ते आँधियों में उड़ जाते 
पर तू चट्टान है, ये  मान  कर 
मंजिल  है  तेरी  महबूबा  
कर कोशिश तू उसको पाने की 
तेरा  हौसला  तेरा  साथी  है 
जरुरत  नहीं  तुझे  ज़माने  की 
वक़्त तेरे साथ है अभी 
जीत की आदत तू डाल ले
लक्ष्य  को  खुदा  और  
कर्म  को  इबादत  बना  ले 


हितेश कुमार शर्मा 










1 जनवरी 2017

मुहब्बत इक इबादत

ये जो तेरे दिल में उनकी मोहब्बत है
ये तेरे मेहबूब की इक अमानत  है 
जिसकी हर एक सांस है तेरे खातिर 
ये भी खुदा की इक बड़ी इबादात है 
 
दर्द ए दिल को जुबान पर ख़तम कर 
अगर तेरे दिल में उनकी शिकायत है 
मेहबूब की मुहब्बत को खुदा मान  
अगर जिन्दा तेरे अंदर कुछ शराफत है 
कद्र है उनके दिल में तेरी मुहब्बत  की 
ये मेहबूब की तेरे ऊपर इनायत है 
दिल से दिल का सौदा सस्ता नहीं हितेश 
पल पल इमितहान इश्क की आदत है 
हितेश कुमार शर्मा 

8 दिसंबर 2016

हितवाणी -4

कोरे कागज दिल पर , प्रेम लकीर खींच 
मैली गठरी हुई तेरी ,  देख नयन  मीच 
तन मैल धोयी के , उज्जवल दियो  बनाए 
मन दर्पण होये कैसे , कुछ तो करो  उपाय 
वक़्त पहिया चले सदा , देखे ऊंच न नीच 
पर निंदा से मन मैला,  हुई कीच ही  कीच 
मैले मन के मंदिर में , प्रभु  को दियो  बिठाय 
बेआवाज जब लाठी पड़े ,  आगे  कौन  सहाय 
अग्नि तेरी दौलत की , बुझा न सके कोई और 
एक झटका काल का , छिनता अंतिम कौर 
समझ सको तो समझ लो , हितवाणी के बोल 
स्वर्ण सज़ा तन तेरा,  बिकता  फिर  बेमोल 
हितेश कुमार शर्मा 

22 अक्टूबर 2016

दिलों की सरहद

दिलों में बनी सरहद को अब मिटाना  होगा
पानी होते खून को फिर खून बनाना होगा 
मोहब्बत के लफ्ज जो नफरत की परिभाषा बने 
उन्ही लफ्जों को अब अमन की माला में पिरोना होगा 
 
वतन की  मिटटी की खुशबु कहीं खो सी रही है 
उसी मिटटी का तिलक अब सबके माथे पर लगाना होगा 
धुंआ-धुंआ होती दिवाली बहुत मना चुके अब 
मोहब्बत का दीया हर दिल में जलाना होगा 
गैरों के लिए अपनों को बहुत ठोकर मार ली 
बिछुड़े हुओं को फिर पलकों पर बिठाना होगा 
जलवों से जिनके रोशन हैं हिन्द की सरहदें 
अमन और भाईचारे से मुल्क का कर्ज चुकाना होगा 
वक़्त के पहिये में हर कोई यहाँ कुचला गया हितेश  
वरना मोहब्बत के जहाँ में नफरत का कहाँ ठिकाना होगा 

3 सितंबर 2016

अजीब कहानी

यहाँ हर धर्म की  इक  अजीब  कहानी  है 
अपना  खून  खून  दूसरों  का  पानी  है 
वक़्त की गजब चाल को समझे भी कैसे 
नफरत की गिरफ्त में यहाँ हर जवानी  है 
किसी के खून से जंगो का  फैसला नहीं होता 
कोई कांच को हीरा समझे तो उनकी नादानी है 
बैठे हैं जो आज भी मोहब्बत के इंतज़ार में 
मोहब्बत की गलियों में मगर अभी वीरानी है  
भटक गए हैं जो नफरत के घुप अंधियारे में 
चिराग ऐ मोहब्बत से जिंदगी में उनकी सहर लानी है 
मज़हब  की  दीवारें  मज़बूत  हुई  तो  क्या 
दिलों में बनी नफरत की दीवारें अब गिरानी है 
बहुत सो चुका अब तो जागना ही होगा हितेश  
अमन ओ चैन की लिखनी अब नयी कहानी है 

17 जून 2016

बारिश की बूँदों में






सूखी धरा हरी भरी हुई 
बारिश  की  बूँदों  में 
प्रकृति की हुई छट्ठा नयी 
बारिश  की  बूँदों  में 
नीलगगन पर श्यामल घटा 
बारिश  की  बूँदों  में 
धरती से धूल पर्दा  हटा 
बारिश  की  बूँदों  में 
कल- कल करती सरिता की धारा 
बारिश  की  बूँदों  में 
दूर हुआ किसान का अँधियारा 
बारिश  की  बूँदों  में 
नव यौवना केश जो  झटके 
बारिश  की  बूँदों  में 
प्रियतम मन केशो में भटके 
बारिश  की  बूँदों  में 
जीवंत होती मिलन परिभाषा 
बारिश  की  बूँदों  में 
पूर्ण होती प्रेम अभिलाषा 
बारिश  की  बूँदों  में 
संगीतमय कोयल की बोली 
बारिश  की  बूँदों  में 
बादल संग सूरज की आंखमिचौली 
बारिश  की  बूँदों  में 
हरयाली से महकता हर आँगन 
बारिश  की  बूँदों  में 
दूर होता हित मन का सूनापन 
बारिश  की  बूँदों  में