| न भूले तुम , न भूले हम | |||
| मोहब्बत किसी की न थी कम | |||
| दुनिया के झूठे रीति - रिवाजो ने | |||
| धर्म से निकले अल्फाजों ने | |||
| इस जहाँ से हमें मिटा दिया | |||
| उसे दफनाया, मुझे जला दिया | |||
| जिंदगी की बेवफाई समझ में आई | |||
| दी जाती जहाँ धर्मो की दुहाई | |||
| अजीब है दुनिया का कायदा | |||
| खुदा भी बांटा आधा आधा | |||
| लेकिन हम मर कर भी जिन्दा है | |||
| खुले आस्मां के आज़ाद परिंदा है | |||
| जहाँ एक धरती एक है आसमान | |||
| नहीं जहाँ धर्मो के हैं निशान | |||
| मस्जिद भी मेरी मंदिर भी मेरा | |||
| अब हर घर पर है अपना बसेरा | |||
| खुश हैं इस दुनिया अंजान में | |||
| नहीं उलझता कोई गीता -कुरान में | |||
| सुर नहीं था जीवन के तरानों में | |||
| अपनापन मिला जाकर बेगानो में | |||
| बादलों के बीच लगता फेरा अपना | |||
| हर सांझ अपनी हर सवेरा अपना | |||
| अब न कोई गम, न कोई सितम | |||
| नयी दुनिया का एक ही नियम | |||
| न भूले तुम , न भूले हम | |||
| मोहब्बत किसी की न थी कम | |||
| हितेश कुमार शर्मा | |||
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16 दिसंबर 2017
नयी दुनिया
11 नवंबर 2017
जिंदगी का मान न कर
| बड़ी ख़ुशी के लिए छोटी ख़ुशी को कुर्बान न कर |
| खुदा के हसीं लम्हो का तू यूं अपमान न कर |
| कतरा-कतरा मिट जाएगी तेरी जिंदगी यूं ही |
| जन्नत जमीं पर है तेरी ,काबू में आसमान न कर |
| समेट ले हर हसीं लम्हे को तू दामन में |
| पहले ही देर है अब तू सुबह से शाम न कर |
| धुलने दे दिल के जज़्बातों को किसी के आंसुओं से |
| बेवजह यूं ही तू अपने पराये की पहचान न कर |
| इन बेवफा साँसों का पल भर का भी भरोसा नहीं |
| तू यूं ही सालों का इकठा सामान न कर |
| जहाँ जीत कर भी हासिल क्या हुआ सिकंदर को |
| मौत साथ है तेरे तू इस जिंदगी का मान न कर |
| तेरा ये ठिकाना कल किसी और का घर होगा हितेश |
| जिंदगी की चाह में तू मौत को यूं बदनाम न कर |
24 जून 2017
अंतिम अनुभव
| उम्र के अंतिम पड़ाव पर | |||
| सुध बुध भी खो गयी | |||
| बंद कमरे में एक छोटी सी खिड़की | |||
| मेरी सारी दुनिया हो गयी | |||
| जो मुझे साँझ और सवेरे | |||
| से परिचित करवाती थी | |||
| झरोखे से आती सूरज की रौशनी | |||
| सिर्फ एक कोने तक आती थी | |||
| ये जर्जर शरीर अपनी ही हडियों का | |||
| बोझ भी नहीं उठा पाता था | |||
| तन्हाई अब सिर्फ साथी थी अपनी | |||
| इसी से अपने दिल को बहलाता था | |||
| जिंदगी का सफर जब शुरू हुआ था | |||
| तब साथ में इक मेला था | |||
| मगर अब परिवार के बीच भी | |||
| मैं बिलकुल अकेला था | |||
| मुठी भर दवाइयां ही | |||
| अब आगे की सच्ची साथी थी | |||
| अंतिम अनुभव में ये सीखा | |||
| कि ये ही अंत तक साथ निभाती थी | |||
| अगली सुबह ऐसा लगा जैसे | |||
| मैं हवा में उड़ रहा था | |||
| मेरा शरीर अंतिम सफर के लिए | |||
| चार कन्धों पर आगे बढ़ रहा था | |||
| उस टूटे हुए पिंजरे से | |||
| अब पंछी आज़ाद हो चुका था | |||
| काफी इंतज़ार के बाद ही सही | |||
| इक नए सफर का आगाज़ हो चुका था | |||
7 मई 2017
उस से हमें क्या ( व्यंग)
| अपने खून से करते जो वतन की | |||
| हिफाजत तो उस से हमें क्या | |||
| मिलती तुम्हे गोली ,पत्थरों से | |||
| क़यामत तो उस से हमें क्या | |||
| झेली होगी तुमने जो दुश्मन की | |||
| गोलियां अपने सीने पर | |||
| कहते होंगे कोई उसे भी | |||
| शहादत तो उस से हमें क्या | |||
| देशप्रेम का जज्बा अगर तुम्हारे | |||
| अंदर बे वजह भरा यूँ ही | |||
| आपका परिवार देता है इसकी | |||
| इज़्ज़ाजत तो उस से हमें क्या | |||
| अपना खुदा तो मंदिर मस्जिद | |||
| में कहीं छिपा बैठा है कोने में | |||
| वतन की हिफाजत को तुम कहते हो | |||
| इब्बादत तो उस से हमें क्या | |||
| अपनी नई नवेली दुल्हन के | |||
| हसींन अरमानो की जगह | |||
| तुम ने अगर वतन से है | |||
| मोहब्बत तो उसे से हमें क्या | |||
| तुम्हारी जान की कीमत कोई | |||
| चुका न सका इस ज़माने में | |||
| अगर इस बात से तुम्हे है | |||
| शिकायत तो उस से हमें क्या | |||
| वतन की मिटटी को अपने खून से | |||
| सींच कर तुम विदा हुए जो | |||
| होगी तुम्हारी अर्थी पर फूलों की | |||
| सजावट तो उस से हमें क्या | |||
13 फ़रवरी 2017
सफलता की बुनियाद
| क्या हुआ जो तेरे पथ में शूल हैं | ||
| क्या हुआ जो समय प्रतिकूल है | ||
| वक़्त की उलटी हवाओं में | ||
| काली और घनघोर घटाओं में | ||
| कर्मो की बुनियाद पर | ||
| सफलता के महल बनाता चल | ||
| मायूसी की काली रातों में | ||
| ख़ुशी के दिए जलाता चल | ||
| छोटे छोटे लक्ष्य जोड़ कर | ||
| विशाल कल का निर्माण कर | ||
| सूखे पत्ते आँधियों में उड़ जाते | ||
| पर तू चट्टान है, ये मान कर | ||
| मंजिल है तेरी महबूबा | ||
| कर कोशिश तू उसको पाने की | ||
| तेरा हौसला तेरा साथी है | ||
| जरुरत नहीं तुझे ज़माने की | ||
| वक़्त तेरे साथ है अभी | ||
| जीत की आदत तू डाल ले | ||
| लक्ष्य को खुदा और | ||
कर्म को
इबादत बना ले
|
||
1 जनवरी 2017
मुहब्बत इक इबादत
| ये जो तेरे दिल में उनकी मोहब्बत है | |||
| ये तेरे मेहबूब की इक अमानत है | |||
| जिसकी हर एक सांस है तेरे खातिर | |||
| ये भी खुदा की इक बड़ी इबादात है | |||
| दर्द ए दिल को जुबान पर ख़तम कर | |||
| अगर तेरे दिल में उनकी शिकायत है | |||
| मेहबूब की मुहब्बत को खुदा मान | |||
| अगर जिन्दा तेरे अंदर कुछ शराफत है | |||
| कद्र है उनके दिल में तेरी मुहब्बत की | |||
| ये मेहबूब की तेरे ऊपर इनायत है | |||
| दिल से दिल का सौदा सस्ता नहीं हितेश | |||
| पल पल इमितहान इश्क की आदत है | |||
| हितेश कुमार शर्मा | |||
8 दिसंबर 2016
हितवाणी -4
| कोरे कागज दिल पर , प्रेम लकीर खींच | |||
| मैली गठरी हुई तेरी , देख नयन मीच | |||
| तन मैल धोयी के , उज्जवल दियो बनाए | |||
| मन दर्पण होये कैसे , कुछ तो करो उपाय | |||
| वक़्त पहिया चले सदा , देखे ऊंच न नीच | |||
| पर निंदा से मन मैला, हुई कीच ही कीच | |||
| मैले मन के मंदिर में , प्रभु को दियो बिठाय | |||
| बेआवाज जब लाठी पड़े , आगे कौन सहाय | |||
| अग्नि तेरी दौलत की , बुझा न सके कोई और | |||
| एक झटका काल का , छिनता अंतिम कौर | |||
| समझ सको तो समझ लो , हितवाणी के बोल | |||
| स्वर्ण सज़ा तन तेरा, बिकता फिर बेमोल | |||
| हितेश कुमार शर्मा | |||
22 अक्टूबर 2016
दिलों की सरहद
| दिलों में बनी सरहद को अब मिटाना होगा | ||||
| पानी होते खून को फिर खून बनाना होगा | ||||
| मोहब्बत के लफ्ज जो नफरत की परिभाषा बने | ||||
| उन्ही लफ्जों को अब अमन की माला में पिरोना होगा | ||||
| वतन की मिटटी की खुशबु कहीं खो सी रही है | ||||
| उसी मिटटी का तिलक अब सबके माथे पर लगाना होगा | ||||
| धुंआ-धुंआ होती दिवाली बहुत मना चुके अब | ||||
| मोहब्बत का दीया हर दिल में जलाना होगा | ||||
| गैरों के लिए अपनों को बहुत ठोकर मार ली | ||||
| बिछुड़े हुओं को फिर पलकों पर बिठाना होगा | ||||
| जलवों से जिनके रोशन हैं हिन्द की सरहदें | ||||
| अमन और भाईचारे से मुल्क का कर्ज चुकाना होगा | ||||
| वक़्त के पहिये में हर कोई यहाँ कुचला गया हितेश | ||||
| वरना मोहब्बत के जहाँ में नफरत का कहाँ ठिकाना होगा | ||||
3 सितंबर 2016
अजीब कहानी
| यहाँ हर धर्म की इक अजीब कहानी है | ||||
| अपना खून खून दूसरों का पानी है | ||||
| वक़्त की गजब चाल को समझे भी कैसे | ||||
| नफरत की गिरफ्त में यहाँ हर जवानी है | ||||
| किसी के खून से जंगो का फैसला नहीं होता | ||||
| कोई कांच को हीरा समझे तो उनकी नादानी है | ||||
| बैठे हैं जो आज भी मोहब्बत के इंतज़ार में | ||||
| मोहब्बत की गलियों में मगर अभी वीरानी है | ||||
| भटक गए हैं जो नफरत के घुप अंधियारे में | ||||
| चिराग ऐ मोहब्बत से जिंदगी में उनकी सहर लानी है | ||||
| मज़हब की दीवारें मज़बूत हुई तो क्या | ||||
| दिलों में बनी नफरत की दीवारें अब गिरानी है | ||||
| बहुत सो चुका अब तो जागना ही होगा हितेश | ||||
| अमन ओ चैन की लिखनी अब नयी कहानी है | ||||
17 जून 2016
बारिश की बूँदों में
सूखी धरा हरी भरी हुई |
||
| बारिश की बूँदों में | ||
| प्रकृति की हुई छट्ठा नयी | ||
| बारिश की बूँदों में | ||
| नीलगगन पर श्यामल घटा | ||
| बारिश की बूँदों में | ||
| धरती से धूल पर्दा हटा | ||
| बारिश की बूँदों में | ||
| कल- कल करती सरिता की धारा | ||
| बारिश की बूँदों में | ||
| दूर हुआ किसान का अँधियारा | ||
| बारिश की बूँदों में | ||
| नव यौवना केश जो झटके | ||
| बारिश की बूँदों में | ||
| प्रियतम मन केशो में भटके | ||
| बारिश की बूँदों में | ||
| जीवंत होती मिलन परिभाषा | ||
| बारिश की बूँदों में | ||
| पूर्ण होती प्रेम अभिलाषा | ||
| बारिश की बूँदों में | ||
| संगीतमय कोयल की बोली | ||
| बारिश की बूँदों में | ||
| बादल संग सूरज की आंखमिचौली | ||
| बारिश की बूँदों में | ||
| हरयाली से महकता हर आँगन | ||
| बारिश की बूँदों में | ||
| दूर होता हित मन का सूनापन | ||
| बारिश की बूँदों में |
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