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29 जनवरी 2016

अन्धेरी निशा में नदी के किनारे / सरयू सिंह 'सुन्दर'

अन्धेरी निशा में नदी के किनारे
धधक कर किसी की चिता जल रही है ।

धरा रो रही है, बिलखती दिशाएँ,
असह वेदना ले गगन रो रहा है,
किसी की अधूरी कहानी सिसकती,
कि उजड़ा किसी का चमन रो रहा है,

घनेरी नशा में न जलते सितारे,
बिलखकर किसी की चिता जल रही है ।

चिता पर किसी की उजड़ती निशानी,
चिता पर किसी की धधकती जवानी,
किसी की सुलगती छटा जा रही है,
चिता पर किसी की सुलगती रवानी,

क्षणिक मोह-ममता जगत को बिसारे,
लहक कर किसी की चिता जल रही है ।

चिता पर किसी का मधुर प्यार जलता,
किसी का विकल प्राण, श्रृंगार जलता,
सुहागिन की सुषमा जली जा रही है,
अभागिन बनी जो कि संसार जलता,

नदी पार तृण पर अनल के सहारे
सिसक कर किसी की चिता जल रही है ।

अकेला चला था जगत के सफ़र में,
चला जा रहा है, जगत से अकेला,
क्षणिक दो घड़ी के लिए जग तमाशा,
क्षणिक मोह-ममता, जगत का झमेला,

लुटी जा रही हैं किसी की बहारें,
दहक कर किसी की चिता जल रही है ।

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गीत

8 टिप्‍पणियां:

  1. सरयू सिंह 'सुन्दर' की सुन्दर रचना प्रस्तुति हेतु धन्यवाद!

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  2. इसी कविता को
    फिर से लिखने की हसरत है
    शब्द वही
    अर्थ वही
    पर..
    शैली नयी
    माँगती है
    इज़ाज़त
    यशोदा..

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (30-01-2016) को "प्रेम-प्रीत का हो संसार" (चर्चा अंक-2237) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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