31 जनवरी 2016

हिमालय ताज तेरा बना....राजेश्वरी जोशी


माँ भारती,माँ भारती,
हम सब उतारे तेरी आरती|
हिमालय ताज तेरा बना,
माथे पे तेरे सज रहा|
सागर नतमस्तक हुआ,
पाँवो को तेरे धो रहा|
बाहों सी पर्वत श्रृंखलाएँ,
सौंदर्य तेरा निखारती|
माँ भारती ,माँ भारती,
हम सब उतारे तेरी आरती|

नदियाँ यहाँ कल-कल करे,
हवाएँ खेतो में झूमती|
गेहूँ की बाली झूमर करे,
पेड़ो पर कोयल कूकती|
तू ही तो है हमारे,
देश को सँवारती|
माँ भारती,माँ भारती,
हम सब उतारे तेरी आरती|

सिंह पर आरूढ़ हो माँ,
तिरंगा हाथों में धारती|
अपनी एक हुंकार से माँ,
दुश्मनों को है संहारती|
तू ही तो हे माँ हमें,
कष्टो से है निवारती|
माँ भारती,माँ भारती,
हम सब उतारे तेरी आरती|


-राजेश्वरी जोशी
उत्तराखंड,भारत

29 जनवरी 2016

अन्धेरी निशा में नदी के किनारे / सरयू सिंह 'सुन्दर'

अन्धेरी निशा में नदी के किनारे
धधक कर किसी की चिता जल रही है ।

धरा रो रही है, बिलखती दिशाएँ,
असह वेदना ले गगन रो रहा है,
किसी की अधूरी कहानी सिसकती,
कि उजड़ा किसी का चमन रो रहा है,

घनेरी नशा में न जलते सितारे,
बिलखकर किसी की चिता जल रही है ।

चिता पर किसी की उजड़ती निशानी,
चिता पर किसी की धधकती जवानी,
किसी की सुलगती छटा जा रही है,
चिता पर किसी की सुलगती रवानी,

क्षणिक मोह-ममता जगत को बिसारे,
लहक कर किसी की चिता जल रही है ।

चिता पर किसी का मधुर प्यार जलता,
किसी का विकल प्राण, श्रृंगार जलता,
सुहागिन की सुषमा जली जा रही है,
अभागिन बनी जो कि संसार जलता,

नदी पार तृण पर अनल के सहारे
सिसक कर किसी की चिता जल रही है ।

अकेला चला था जगत के सफ़र में,
चला जा रहा है, जगत से अकेला,
क्षणिक दो घड़ी के लिए जग तमाशा,
क्षणिक मोह-ममता, जगत का झमेला,

लुटी जा रही हैं किसी की बहारें,
दहक कर किसी की चिता जल रही है ।

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गीत

27 जनवरी 2016

कैसा तेरा प्यार था

(तेजाब हमले के पीड़िता की व्यथा)

कैसा तेरा प्यार था ?
कुंठित मन का वार था,
या बस तेरी जिद थी एक,
कैसा ये व्यवहार था ?

माना तेरा प्रेम निवेदन,
भाया नहीं जरा भी मुझको,
पर तू तो मुझे प्यार था करता,
समझा नहीं जरा भी मुझको ।

प्यार के बदले प्यार की जिद थी,
क्या ये कोई व्यापार था,
भड़क उठे यूँ आग की तरह,
कैसा तेरा प्यार था ?

मेरे निर्णय को जो समझते,
थोड़ा सा सम्मान तो करते,
मान मनोव्वल दम तक करते,
ऐसे न अपमान तो करते ।

ठान ली मुझको सजा ही दोगे,
जब तू मेरा गुनहगार था,
सजा भी ऐसी खौफनाक क्या,
कैसा तेरा प्यार था ?

बदन की मेरी चाह थी तुम्हे,
उसे ही तूने जला दिया,
आग जो उस तेजाब में ही था,
तूने मुझपर लगा दिया ।

क्या गलती थी मेरी कह दो,
प्रेम नहीं स्वीकार था,
जीते जी मुझे मौत दी तूने,
कैसा तेरा प्यार था ?

मौत से बदतर जीवन मेरा,
बस एक क्षण में हो गया,
मेरी दुनिया, मेरे सपने,
सब कुछ जैसे खो गया ।

देख के शीशा डर जाती,
क्या यही मेरा संसार था,
ग्लानि नहीं तुझे थोड़ा भी,
कैसा तेरा प्यार था ?

अब हाँ कह दूँ तुझको तो,
क्या तुम अब अपनाओगे,
या जो रूप दिया है तूने,
खुद देख उसे घबराओगे?

मुझे दुनिया से अलग कर दिया
जो खुशियों का भंडार था,
ये कौन सी भेंट दी तूने,
कैसा तेरा प्यार था ?

दोष मेरा नहीं कहीं जरा था,
फिर भी उपेक्षित मैं ही हूँ,
तुम तो खुल्ले घुम रहे हो,
समाज तिरस्कृत मैं ही हूँ ।

ताने भी मिलते रहते हैं,
न्याय नहीं, जो अधिकार था,
अब भी करते दोषारोपण तुम,
कैसा तेरा प्यार था ?

क्या करुँ अब इस जीवन का,
कोई मुझको जवाब तो दे,
या फिर सब पहले सा होगा,
कोई इतना सा ख्वाब तो दे ।

जी रही हूँ एक एक पल,
जो नहीं नियति का आधार था,
करती हूँ धिक्कार तेरा मैं,
कैसा तेरा प्यार था ?

-प्रदीप कुमार साहनी

23 जनवरी 2016

हँसी में घुल जाती है.......विवेक रतन सिंह


हँसी में घुल जाती है 
ख़ुशी में मिल जाती है 
है  अनीता एक  सुगंध मधुर 
हर पुस्तक  में मुस्काती है 
लिखकर वो भाव अपने 
जीवन  को जगमगाती   है 
और झिलमिल-झिलमिल तारों को  भी 
चाँद बन  वो  पढ़ाती है 

****

एक अलग किस्म की छटा है वो  
हृदय के हर्ष की वो  सुंदरता है 
जो भी उससे मिल लेता है 
पुष्प सा वो भी खिलता है 
अलंकृत हो जाता है वो क्षण 
जिससे करती वो मित्रता है 
सुबह का आभामयी सूरज 
उसकी ही तो प्रसन्नता है 

*****
वीरता का एक काव्य है वो 
वीरों से भरी वो  गाथा है 
उसका हर शब्द, शब्द से साहस लेकर 
अपूर्व शौर्य बन जाता है 
है तलवार सा कभी वो करता नृत्य 
तीर सा कभी वो गाता है 
कभी घोड़े पे होकर सवार वो 
लहराता विजय की पताका है 

***
मन के इंद्रधनुषी रंगों से 
चित्र जग के वो बनाती है 
नदिया सी वो बहती है 
सागर सी वो गहराती है 
बन आकाश  जहाँ में सारे 
सिर्फ़ खुशियाँ वो फैलाती है 
उसका एक नाम नई ख़ुशी भी है 
और वो खुद भी खुशहाली है 

***** 
हँसी में घुल जाती है 
ख़ुशी में मिल जाती है 
है  अनीता एक  सुगंध मधुर 
हर पुस्तक  में मुस्काती है 
लिखकर वो भाव अपने 
जीवन  को जगमगाती   है 
और झिलमिल-झिलमिल तारों को  भी 
चाँद बन  वो  पढ़ाती है 

-विवेक रतन सिंह 

22 जनवरी 2016

बहुत परेशान है मेरी कविता -- संजय भास्कर

( चित्र - गूगल से साभार )
बहुत परेशान है मेरी कविता
कुछ सच्ची कुछ झूठी है मेरी कविता !!

कोशिश करता हूँ लिखू कठिन शब्दों में
पर बहुत ही सरल शब्दों में है मेरी कविता  !!

लिखना चाहता हूँ हमेशा बड़ी कविता
पर अक्सर छोटी ही रह जाती है मेरी कविता !!

जो शब्द,लफ्ज विचार आते है मन में लिख देता हूँ
इन सब को मिला कर तैयार हुई है मेरी कविता  !!

दर्द के लम्हो को लिख दिया कागज पर
तभी तो बहुत परेशान है मेरी कविता  !!

- संजय भास्कर

17 जनवरी 2016

वो हँस के क्या मिला मेरी किस्मत बदल गई....संजय कुमार गिरि

सूरत बदल गई कभी सीरत बदल गई।
इंसान की तो सारी हक़ीक़त बदल गई।

पैसे अभी तो आए नहीं पास आपके,
ये क्या अभी से आप की नीयत बदल गई।

मंदिर को छोड़ "मयकदे" जाने लगे हैं लोग,
इंसा की अब तो तर्ज़े-ए-इबादत बदल गई।

खाना नहीं ग़रीब को भर पेट मिल रहा,
कैसे कहूँ गरीब की हालत बदल गई।

नफ़रत का राज अब तो हर सू दिखाई दे,
पहले थी जो दिलों में मुहब्बत बदल गई।

देता न था जवाब जो मेरे सलाम का,
वो हँस के क्या मिला मेरी किस्मत बदल गई।


संजय कुमार गिरि
sanjaygiri75@gmail.com

16 जनवरी 2016

सह अस्तित्व.... विद्या गुप्ता



सूरज आग का गोला ही सही  

गैसों का बवंडर ही सही 

मगर, पीता है अभी भी 

अर्ध्य का जल 


धरती में है कितने कितने 

चट्टानी रहस्य 

फिर भी बचा है ,

माँ जैसा गुनगुनापन जो ,

अंकुरों में भरता

दानों में झरता हैं दूध सा 


अतल में है कहीं तल

छोर में अछोर 


विज्ञान के कटघरे में 

बे -दिल है चाँद ,मगर

अभी भी धडकता है अबोध

बाल मन का मामा बनकर .

.बचपन का चन्द्र खिलौना सा.

.करवाचौथ की मनुहार सा.


नदी को आचमन 

सूर्य को नमन 

आग को हवन 

जल को तर्पण 

देकर हम देखते है-

विराट से गुंथा अपना अस्तित्व


-विद्या गुप्ता







13 जनवरी 2016

मकर संक्रांति पर नरेंद्र मोदी जी द्वारा रचित कविता














उत्सव
पतंग
मेरे लिए उर्ध्वगति का उत्सव
मेरा सूर्य की ओर प्रयाण।
पतंग
मेरे जन्म-जन्मांतर का वैभव,
मेरी डोर मेरे हाथ में
पदचिह्न पृथ्वी पर,
आकाश में विहंगम दृश्य।
मेरी पतंग
अनेक पतंगों के बीच...
मेरी पतंग उलझती नहीं,
वृक्षों की डालियों में फंसती नहीं।
पतंग
मानो मेरा गायत्री मंत्र।
धनवान हो या रंक,
सभी को कटी पतंग एकत्र करने में आनंद आता है,
बहुत ही अनोखा आनंद।
कटी पतंग के पास
आकाश का अनुभव है,
हवा की गति और दिशा का ज्ञान है।
स्वयं एक बार ऊंचाई तक गई है,
वहां कुछ क्षण रुकी है।
पतंग
मेरा सूर्य की ओर प्रयाण,
पतंग का जीवन उसकी डोर में है।
पतंग का आराध्य(शिव) व्योम(आकाश) में,
पतंग की डोर मेरे हाथ में,
मेरी डोर शिव जी के हाथ में।
जीवन रूपी पतंग के लिए(हवा के लिए)
शिव जी हिमालय में बैठे हैं।
पतंग के सपने(जीवन के सपने)
मानव से ऊंचे।
पतंग उड़ती है,
शिव जी के आसपास,
मनुष्य जीवन में बैठा-बैठा,
उसकी डोर को सुलझाने में लगा रहता है।

First Published: Tuesday, January 14, 2014 - 20:13

10 जनवरी 2016

हमसफर न हुए ---------- प्रदीप कुमार साहनी

चंद कदम भर साथ तुम रहे,
संग चल कर हमसफर न हुए,

पग पग वादा करते ही रहे,
होकर भी एक डगर न हुए ।

तेरी बातें सुन हँसती हैं आँखें,
खुशबू से तेरी महकती सांसे,

दो होकर भी एक राह चले थे,
संग चल कर हमसफर न हुए,

एक ही गम पर झेल ये रहे,
होकर भी एक हशर न हुए ।

फिर से तेरी याद है आई,
पास में जब है इक तन्हाई,

भ्रम में थे कि हम एक हो रहे,
संग चल कर हमसफर न हुए,

अच्छा हुआ जो भरम ये टूटा,
होकर भी एक नजर न हुए ।

दिल में दर्द और नैन में पानी,
अश्क कहते तेरी मेरी कहानी,

यादें बन गये वो चंद लम्हें,
संग चल कर हमसफर न हुए,

धरा रहा हर आस दिलों का,
होकर भी एक सफर न हुए ।

-प्रदीप कुमार साहनी

9 जनवरी 2016

इक ही हक़ीक़त बनी रहे . .पम्मी सिंह












नव वर्ष की
नवोत्थित शफ़क़
यूँ ही बनी रहे . .
हमारे एवानो में
आसाइशे से नज़दीकियों की
सफ़र बहुत छोटी हो
साथ ही उन दहकानों की दरें
भी जगमगाती  रहे . .
ख्वाबों में भी
इन अज़ीयते से
दूरियाँ बहुत लम्बी हो
इन्सानियत फ़ना होने से
बचती  रहे. .
अहद ये करें कि
फ़साने कम  हो
इक ही हक़ीक़त बनी रहे . .
ये शफ़क़ घरो में
खिलती रहे..







-पम्मी सिंह
:: शब्दार्थ ::
शफ़क़ -क्षितिज  की लाली (dawn), नवोत्थित -नया उठा हुआ (new rising day)
एवानो - महल (palace.home), आसाइशों -सुख  समृधि (well being). दहकानों -किसान (farmer)
अज़ीयते - दुख  दर्द (unhappy,sad), अहद -प्रतिज्ञा (oath)

मूल रचना

8 जनवरी 2016

दिल्ली की सर्दी ...........हितेश कुमार शर्मा



                                                                                              
कहाँ  गयी  तू    दिल्ली  की  सर्दी 
इस बार तूने देर से आने की हद कर दी 
वो   सर्द  दिन,  वो  ठिठुरन  भरी  रातें 
नहीं दिख रहा कोई हाथ रगड़ते और कंपकपाते 
धुंध भरी सुबह का आलम भी कहीं खो  गया 
मेरी दिल्ली की सर्दी को इस बार ये क्या हो गया 
क्या इस बार गर्म कपडे यूं ही रखे रह जाएंगे 
और जनवरी में क्या, अप्रैल का मज़ा उठाएंगे 
तेरा  इंतज़ार  तो  हम  पूरा  साल  करते  हैं 
तू नाराज़ मत होना, हम तो सिर्फ गर्मी से डरते हैं 
कोहरे की चादर से, ढक दो, दिल्ली के दामन को 
कब  से  हम  प्रतीक्षारत  हैं  तेरे  आगमन  को 
तुझ संग मिलन का साल में कुछ ही समय मिलता है 
नहीं तो पूरा साल ,ये बदन गर्मी में ही जलता है 
न इस बार तू आई और न तेरी सहेली वर्षारानी 
अब  भी    जाओ, मत  करो  यूं  मनमानी 
तू है प्रसिद्ध बड़ी, तेरे गीत  गाते सारे देशवासी 
अपनी ठंडी हवाओं से दूर करो हमारी उदासी 

हम परिवर्तित हो रहे हैं--यशोदा

ब्लॉग लिखे जाते हैं..
तात्कालिक घटना के आधार पर
मत- तोहमत यथायोग्य दी जाती है
व लगाई भी जाती है
फिर..सब मिट जाता है जेहन से....
पर हम ये भूल जाते हैं कि
हम कवि व साहित्यकार हैं
शिक्षक हैं..कथाकार हैं
मीडिया नहीं न हैं
हम समझदार गुणवान हैं..
हमारा लिखा पाठ्य-पुस्तकों का
हिस्सा बनता है
हम लिखते हैं
तात्कालिक घटनाओं पर...
और अकल मिलती है
मीडिया वालों को
उसी को बार-बार प्रसारित कर
आम जनता को..
भ्रमित करते रहते हैं वे.
...
यशोदा दीदी की कलम से...

4 जनवरी 2016

आख़िर कब तक..........राजेश्वरी जोशी










आख़िर कब तक,
शब्दों को मेरे 
तुम बंदी बना पाओगे
एक ना एक दिन
तो तुम्हारे द्वारा 
चिनी गयी ये 
रूढ़ियों की दीवारें
मेरे विचारों की
तेज़ आँधियों से
टूट कर गिर जाएँगी

मेरे शब्द उड़ने लगेंगे
दूर-दूर तक हवा में
करने लगेंगे फूल-पत्ती,
नदी पर्वत से संवाद
कण-कण से टकराएँगे
दूर-दूर तक फैल जाएँगे
धरती से अंबर तक 

और फिर होगा
नया एक प्रभात
रूढियों से मुक्त समाज
लिखेगा एक नया इतिहास।

-राजेश्वरी जोशी

नाम : श्रीमती राजेश्वरी जोशी (स.अ.)
उधम सिंह नगर, उत्तराखंड
जन्म : 8 जून 1968
शिक्षा : एम.एससी. बी.एड
सम्पर्क : rajeshwaripantjoshi22@gmail.com