ब्लौग सेतु....

21 जून 2017

तिमिर बंध

चीरकर सीना तम का
सूर्य दिपदिपा रहा
तोड़कर के तिमिर बंध
भोर मुस्कुरा रहा
उठ खड़ा हो फेंक दो तुम
जाल जो अलसा रहा
जो मिला जीवन से उसको
मन से तुम स्वीकार लो
धुँध आँखों से हटा लो
आसमां पे नाम लिख
जीवन की उर्वर जमीं में
कर्मों का श्रृंगार कर लो

जो न मिला न शोक कर
जो मिल रहा उपभोग कर
न भाग परछाई के पीछे
यही पाँव दलदल में खींचे
न बनाओ मन को काँच घट
हल्की ठेस से दरके हृदय पट
जिंदगी की हर कहानी का
मुख्य तुम किरदार हो
कर्म तुम्हारे तुम्हारी ज़ुबानी
बोलते असरदार हो
जीवन की लेखनी को धार कर लो
   
लड़कर समर है जीतना
हर बखत क्या झींकना
विध्न बाधा क्या बिगाडे
तूफां में रहे अडिग ठाडे
निराशा घुटन की यातना
ये बंध कठिन सब काटना
चढ़ कर इरादों के पहाड़
खोल लो नभ के किवाड़
खुशियाँ बाहें फैलाती मिलेगी
भर अंजुरी स्वीकार कर लो

      #श्वेता🍁

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (22-06-2017) को
    "योग से जुड़ रही है दुनिया" (चर्चा अंक-2648)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. सादर आभार महोदय आपका।

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