ब्लौग सेतु....

20 अक्तूबर 2016

बेजान से रिश्ते - Anu Chakraborty


लम्बे समय से वेंटिलेटर पर रखे ,
एक बेजान से रिश्ते को ,
आखिरकार मिल ही गई मुक्ति !
चलो अच्छा हुआ ;
अब किस्तों में मिल रही ,
हर पल की मौत
का ना तो कोई खौफ़ रहा
और ना ही ,
बाकि रही कोई आस जीवन की ....
लम्हा -दर-लम्हा ,
पिघलते जा रहे मोम से ज़ज्बातों को ,
अब किसी बाती से ना होगा
फिर कभी इश्क !
सुना था मैंने ;
गंभीर संक्रमण की चपेट में आने से ,
रिश्ता हो या हो इंसान !
दोनों का ही बच पाना
हो जाता है थोड़ा मुश्किल ,
नीम -हकीम , पीर -पैगम्बर
अपनी- अपनी तरह से करते हैं लाख जतन ,
दिलाते हैं भरोसा नई उम्मींदों का ...
पर हर रोज़ हज़ार फौत के
साये में पल रहे रिश्ते को
ज़रूरत आन पड़ती है -
कभी ना कभी ;
इच्छामृत्यु की !!
हाँ ..... हाँ ,
मैंने उस नासूर बन चुके आदत को ,
दे दिया आखिर धीमे से विष !
निकल दिया श्वास-नलिका से भीतर
जा रहे ऑक्सीजन के पाइप को ...
मुक्त कर दिया
रुग्ण भावनाओं से सिक्त ज्वार के आवेग को ...
क्यूंकि
मुझे लगता है -
दुनिया का सबसे बड़ा
और
मुश्किल काम होता है ,
खुद को समझाना ...
और देखो
मैंने ये काम भी आज बखूबी कर ही लिया ...
समझ चुकी हूँ पूरी तरह से
कि - अब तुमको गए
बहुत वक़्त बीत चुका है

लेखक परिचय -- Anu Chakraborty

फेसबुक वाल से अनु जी की एक बेहतरीन रचना आज सभी के साथ साँझा कर रहा हूँ...........उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

-- संजय भास्कर 


8 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन के गहरे कटु सत्य को शब्दों में लिखा है ... बहुत खूब ..

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  2. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शनिवार (22-10-2016) के चर्चा मंच "जीने का अन्दाज" {चर्चा अंक- 2503} पर भी होगी!
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. अनु जी सुन्दर कविता साझा करने हेतु धन्यवाद संजय जी ..

    उत्तर देंहटाएं

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