ब्लौग सेतु....

17 अक्तूबर 2016

अफियत की वक्त मुक़रर्र कर दो..


अाफियत की वक्त मुक़रर्र कर दो..

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चंद आफियत की

वक्त मुक़रर्र कर दो..

पुरखुलूस की ताब से ही

गुज़रती है जिन्दगी..

हर लबो पर तब्बसुम की आबोताब कर दो..

साजिशें थी दहर के चांद सितारो की

वर्ना खुशियाँ झाँकती हर दरीचों से

इस तरह ही हर पल को ढूढती

एक पल को गुज़ार दो



चंद आफियत की...
                ©पम्मी सिंह 




5 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन रूमानी कविता ... शब्द मन में तैर रहे है

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  2. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (19-10-2016) के चर्चा मंच "डाकिया दाल लाया" {चर्चा अंक- 2500} पर भी होगी!
    करवाचौथ की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    उत्तर
    1. आभार एवम् धन्यवाद उचित मंच पर अवसर
      प्रदान करने के लिए..

      हटाएं
    2. आभार एवम् धन्यवाद उचित मंच पर अवसर
      प्रदान करने के लिए..

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