ब्लौग सेतु....

20 दिसंबर 2017

विधवा

नियति के क्रूर हाथों ने
ला पटका खुशियों से दूर,
बहे नयन से अश्रु अविरल
पलकें भींगने को मजबूर।

भरी कलाई,सिंदूर की रेखा
है चौखट पर बिखरी टूट के
काहे साजन मौन हो गये
चले गये किस लोक रूठ के
किससे बोलूँ हाल हृदय के
आँख मूँद ली चैन लूट के

छलकी है सपनीली अँखियाँ
रोये घर का कोना-कोना
हाथ पकड़कर लाये थे तुम
साथ छूटा हरपल का रोना
जनम बंध रह गया अधूरा
रब ही जाने रब का टोना

जीवन के कंटक राहों में
तुम बिन कैसे चल पाऊँगी?
तम भरे मन के झंझावात में
दीपक मैं कहाँ जलाऊँगी?
सुनो, न तुम वापस आ जाओ
तुम बिन न जी पाऊँगी

रक्तिम हुई क्षितिज सिंदूरी
आज साँझ ने माँग सजाई
तन-मन श्वेत वसन में लिपटे 
रंग देख कर आए रूलाई
रून-झुन,लक-दक फिरती 'वो',
ब्याहता अब 'विधवा' कहलाई

6 टिप्‍पणियां:

  1. a vida é tão simples na essencia ,mais certas atitudes de humanos,são capazes de destruir ate um verdadeiro amor nascido no amago da alma virgem,lamentavel atitude anti humana destroe ele mesmo.

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    1. इस प्रतिक्रिया का अनुवाद पुर्तगाली भाषा से.....
      जीवन सार में बहुत सरल है, मनुष्य के अधिक विशिष्ट दृष्टिकोण, कुंवारी आत्मा की आश्रय में पैदा हुए एक सच्चा प्यार को नष्ट करने में सक्षम हैं, विरोधात्मक विरोधी मानव व्यवहार खुद को नष्ट कर देता है

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    2. बहुत आभार दी,आपने प्रतिक्रिया समझा दी।
      तहेदिल से शुक्रिया आपका।
      सादर।

      हटाएं
  2. मर्मस्पर्शी प्रस्तुति ...

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