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15 दिसंबर 2017

सरगम बनकर आजा सजनी.....के.एल. स्वामी ‘केशव’

सरगम बनकर आजा सजनी
मन-मृदंग बजा जा सजनी ....


मैं मयूर बन करूँगा नर्तन
होगा तन-मन सावन-सावन
उमड़-घुमड़कर बन घटा सी
रिमझिम करती छा जा सजनी
सरगम बनकर आजा सजनी
मन-मृदंग बजा जा सजनी ....


कह ले अपनी, सुन ले मेरी
सुख-सपनें या पीर घनेरी
बाँटेंगे मिलकर के दोनों
हाल-ए-दिल सुना जा सजनी
सरगम बनकर आजा सजनी
मन-मृदंग बजा जा सजनी ....


मैं आवारा बादल जैसा
फिरूँ भटकता पागल जैसा
एक ठिकाना दे-दे मुझको
घर-अँगना बसा जा सजनी
सरगम बनकर आजा सजनी
मन-मृदंग बजा जा सजनी ....


फूलों की माला-सा जीवन
इमरत-सा, हाला-सा जीवन
जो कुछ है, होने से तेरे
होजा मेरी, ना जा सजनी
सरगम बनकर आजा सजनी
मन-मृदंग बजा जा सजनी ....

-© के.एल. स्वामी ‘केशव’

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुंदर....
    आभार सर आप का....

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह.. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति..

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (17-12-2017) को
    "लाचार हुआ सारा समाज" (चर्चा अंक-2820)

    पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    उत्तर
    1. बहुत-बहुत धन्यवाद महोदय ! नमन......

      हटाएं

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